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अच्छी अनुभव की बातें - 3

हार्ड को साॅफट बनाने में, आपको अंदर से सुपर साॅफट और सुपर हार्ड होना पड़ेगा जो कि आध्यात्म द्वारा ही संभव है। आपकी वाणी एक ऐसा शस्त्र जो अनेक आत्माओं के कमजोरीयों के बंधन काट सकता है , उन्हें नयी जीवन जीने की राह दिखा सकता है, उनमें नयी उर्जा का संचार कर सकता है। आपके अनुभव की शक्ति दूसरों को परिवर्तन होने की राह दिखाने में सक्षम है। आपकी समर्थी(शक्ति )सिर्फ आपके अपने तक सीमित नहीं  है , बल्कि अनेकों के उत्थान के लिए है जो आपके आस पास है। जीवन की परिस्थितियां चुनौती है,इनका आह्वान करने वाला ,इन पर जीत पाने वाला व्यक्ति ही महावीर है,शिव शक्ति है। इंतजार में समय गंवाने वाला व्यक्ति कमजोरियों का आह्वान करता है और अपने भाग्य से भी वंचित हो जाता है। निस्वार्थ भाव से किए हुए कर्म जीवन को चमकाते हैं और जीवन की शान को बढ़ाते हैं। अपने स्वयं का टीचर बन स्वयं को पढ़ाने वाले अपने साथ अनेको के लिए पुण्य की पूंजी जमा कराने के निमित्त बनाता है । किसी की भलाई के , सन्मार्ग पर लाने  के लिए किए गए कर्म श्रेष्ठ है भले ऐसे कर्मों को कितने opposition का सामना  क्यों न करना पड़े। आपकी सत्यता ...

अच्छी अनुभव की बातें - 2

 सभी से सीखने वाला , झुकने वाला व्यक्ति अपनी क्षमता से कहीं अधिक प्राप्ति करता है और दूसरों को भी कहीं ज्यादा आगे बढ़ने के उमंग लाता है। आपको समय पर सीखाने,सहारा देने वाले व्यक्तियों का हमेशा दिल से आभार माने,आभार की शक्ति आपकी अनेक सोई हुई क्षमताओं और शक्तियों को जागृत करेगी। बीती बातों को विदाई देने का अर्थ है, उनसे सीख लेकर, भविष्य के लिए अपने को तैयार करना। परिवर्तन की शक्ति से अपनी पास्ट की भूलों को ऐसा मिटा दो ,जैसे कभी थी ही नहीं। स्नेह का अर्थ सिर्फ इतना नहीं है कि जिसे जो पसंद है, उसे वह  दे दो,करने दो, बल्कि उनको उनके भविष्य के लिए, उनके जीवन में आने वाली अनेक परिस्थितियों के लिए उनको तैयार करना ही सच्चा स्नेह है। दूसरों को सशक्त बनाने में अगर स्वयं को  थोड़ा सहन भी करना पड़े,झुकना भी पड़े तो ये आपको अनेक ईश्वरीय शक्तियों का मालिक बना देगा। प्रकृति द्वारा आए हुई चुनौतीयों को मास्टर प्रकृतिपति बन कर ऐसे जीत लो जैसे, ये प्रकृति आपकी सेवा में हाजिर हो और आपके order पर सब कार्य करती हो।

अच्छी अनुभव की बातें - 1

 जो मनुष्य अपनी प्राप्तियों द्वारा सभी को सुख पहुंचाता है वो समय पर  सभी के द्वारा सम्मान और सर्व प्राप्तियों का अधिकारी बन जाता है। समय पर सभी को सहयोग देने वाला व्यक्ति,जीवन में दुआओं के बल से सदा आगे बढता है। शुभ भावना एक ऐसा बल है, जो अनेक मुश्किल परिस्थितियों से पार कराने का सहज साधन है।  जो व्यक्ति सभी को आगे बढ़ाता है,वह स्वयं पहले अपने आप में बहुत आगे निकल जाता है।   छल कपट और वैर भाव मनुष्य की आंतरिक शक्ति और क्षमता का हनन करती है। अंदर एक और बाहर दूसरा,ऐसे  व्यक्तित्व  वाला व्यक्ति थोड़े समय के लिए  तो जीवन में  छोटी मोटी सफलता का अनुभव कर सकता है पर  लम्बे काल मे जीवन की असल परिक्षाओं में जहां आपके चरित्र की परख होती है,वहां हार जाता है। अंतरात्मा की सच्चाई, मनुष्य के व्यक्तित्व को अंदर से निखारती है,इसका बाहृय दिखावे से कोई लेंन देन नहीं है। मनुष्य जीवन का असली खजाना , उसके जीवन में कमाई हुई शुभ भावनाएं है,जो कि उसके जीवन की असली पूंजी है। ईर्ष्या और घृणा मनुष्य को काला और शक्तिहीन बना देती है। सफलता पाने के लिए इनका सहारा लेना अर...

कबीर दास के प्रेरणादायक दोहे

 कबीर दास के प्रेरणादायक दोहे 1. बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय। जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय॥ अर्थ- कबीर कहते हैं कि जब मैं इस दुनिया में बुराई खोजने गया, तो मुझे कुछ भी बुरा नहीं मिला और जब मैंने खुद के अंदर झांका तो मुझसे खुद से ज्यादा बुरा कोई इंसान नहीं मिला।) . धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय। माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आए फल होय॥  (अर्थ- कबीर दास जी कहते हैं कि धैर्य रखें धीरे-धीरे सब काम पूरे हो जाते हैं, क्योंकि अगर कोई माली किसी पेड़ को सौ घड़े पानी से सींचने लगे तब भी फल तो ऋतु आने पर ही लगेगा।) 3. चिंता ऐसी डाकिनी, काट कलेजा खाए। वैद बिचारा क्या करे, कहां तक दवा लगाए।। (अर्थ- कबीर दास जी कहते हैं कि चिंता एक ऐसी डायन है जो व्यक्ति का कलेजा काट कर खा जाती है। इसका इलाज वैद्य नहीं कर सकता। वह कितनी दवा लगाएगा। अर्थात चिंता जैसी खतरनाक बीमारी का कोई इलाज नहीं है।) 4.  साईं इतना दीजिए, जा मे कुटुम समाय। मैं भी भूखा न रहूं, साधु ना भूखा जाय।। (अर्थ- कबीर दस जी कहते हैं कि परमात्मा तुम मुझे इतना दो कि जिसमें मेरा गुजरा चल जाए, मैं खुद भी अपना पेट पाल सक...

ज्ञान अपने पे लागू करना है

  ज्ञान अपने पे लागू करना है  जैसे अपेक्षा रखना और दुःखी होना गलत है। पर ये बात हमें. खुद पे लागू करनी है दूसरों पर नहीं। हम जानते अपेक्षा होना स्वभाविक है इसलिए हमें खुद को संमपन्न बनाना है और दूसरो की.अपेक्षाओं को पूरा ज़रूर करना है,सभी को सुखी और संतुष्ट करना है, स्नेह निभाना है ,अपना कर्तव्य  पूरा करना है। खुद को सम्पन्न  और संतुष्ट रख सकेगें तब दूसरों को कुछ दे सकेगें। अपेक्षा न रखने का भाव ये है कि जब दूसरों को देखने लगते तो अपनी शक्तियां भूल जाते.है ,भूल जाते है कि हमें देना है। दे तब पाएंगे जब अपने शुद्ध नशे में रहेंंगे। करते क्या.है अपना part और उससे होने वाली प्राप्ति भूल जाते है। सृष्टि चक्र के समय अनुसार अभी सभी को बड़ा ,ऊंच और महान बनना है,परमपवित्र और शुद्ध बनना है,ये भूल जाते है। कभी दूसरों को.बहुत छोटा और हीन देखते है और सोचते हम ही करने.वाले है ,हमारे बिना इनका काम नहीं चलेगा और ये सोच कर अभिमान में आ जाते है और उनका अपमान करने लगते. है,उन्हें नीचे.गिराने.लगते है। कभी दूसरों को बहुत बढ़ा देखने लगते है,कि ये बहुत सम्पन्न है ,हमें कुछ करने की ज़रूरत नहीं। ...

दुआएँ

अपनो से जो स्नेह मिलता ,दुआएँ मिलती, वे अनमोल खज़ाना होती है जीवन का,उससे बढ़ कर कोई सुख नहीं होता दुनिया में।

सिर्फ ज्ञान पता होना काफी नही

सिर्फ ज्ञान पता होना काफी नही। उसे कब और किस विधी से,कितनी मात्रा में देना है यह भी जरूरी है जानना। ज्ञान बंधन काटने का शस्त्र है, न कि बांधने का। इससे किसी को कष्ट पहुंचाना, इसको misuse या abuse करना महापाप है।

माननीय बनना

मान मांगने से नहीं मिलता। लम्बा समय.श्रेष्ठ आचरण मनुष्य को माननीय बनाता है। सम्बंध में थोड़ा झुकना भी पड़ता है,अपनी मत छोड़नी भी पड़ती है।दूसरों को आगें करना भी होता है।निभाना भी पड़ता है।एक श्रेष्ठ. लक्षय को सामने रखना होता है। विश्व परिवर्तन, देवता बनना या महान कार्य की सफलता जिससे सभी प्रसन्नता और संतुष्टता का फल खाए।

सम्बंध अच्छे भी होते है

बच्चे कहते सम्बंध अच्छे भी होते है,सिर्फ दुख थोड़ेही देते है। बाप कहते. हां बच्चे जब एक ने कहा दूसरे ने.मानी दूसरे की बात का भाव ठीक.समझा। अपने को.राइट सिद्ध नहीं किया।जिद्द नहीं की।मान रख लिया किसी के कहने का।और अपने को आसानी से मोल्ड कर लिया तो दुआएं कमा ली सम्बंधों में एक दूसरे की,विश्वास जीत लिया दूसरे. का,अपनी जगह बना ली आपने दूसरों के दिलों में। उनका .स्नेह ,सहयोग पाने के अधिकारी बन गए आप। लेकिन अगर व्यर्थ बातें करते,आना कानी करते बात बात पे,बहानेबाजी करते,अपने को राईट सिद्ध करते,बढ़ा सिद्ध करते तो उससे समय वेस्ट गंवाते हो दूसरे का।

आत्मा का परमात्मा से दिव्य संवाद

बच्चे कहते है,हम सारा दिन बैठ कर थक जाते है. बाप कहते है,मै तुम्हें सब कुछ बैठे बिठाएं दूंगा,तुम्हें मेहनत करने की ज़रूरत नहीं। बच्चे कहते. है. मेहनत करने से सुख मिलता है,आत्मनिर्भरता.अच्छी लगती है। बाप कहते. है दुनिया बहुत गंदी है। बच्चे कहते है अच्छाई भी तो है दुनिया में,हम अच्छाई उठाएंगे। बाप कहते है उसके लिए तुम्हारी बुद्धि बहुत तीक्ष्ण चाहिए। बहुत ऊंची भावनाएं ,बहुत ऊंचे विचार,बहुत ऊंचे कर्म चाहिए। बच्चे कहते है.हां बाबा जो आपके गुण और शक्तियां है वही हमारी है,हम भी आपकी तरह बनेंगे। पर बच्चे तुम हो मेरी तरह,मेरे सभी titles आपके ही है। बच्चे कहते है हम उन्हें कर्म में लाकर अपनी और आपकी शान बढ़ाना चाहते है।हम अपनी खुद की पहचान बनाना चाहते है। हमारे कर्म से हम अपनी पहचान देना चाहते है। बाप कहते है ,बच्चे इस दुनिया बहुत दुख,धोखा है।भ्रष्टाचार,अन्दर बाहर एक नहीं है सब। बच्चे कहते है,हम अपना श्रेष्ठ कर्म करेंगे और हमें.देख दूसरे भी बदल जाऐंगें। बच्चे इसमें समय लगता है जो आत्माएं परिवर्तन हो और उनमें निश्चय बैठे। हां बाबा कोई हर्जा नहीं हम बीज डालते जाएंगें ,आप समय पर फल निकालना। हम अपेक्ष...

वर्तमान समय प्रमाण सेवा का स्वरूप

  ये ऐसा है, वो वैसा है.. अरे  इसमें तुम्हारा क्या जाता, तुम्हें तो बाप को याद करना है. बुद्धि में पुराने संस्कारो की कोई खिट पिट नहीं कोई पद/पृतिष्ठा की दौड़ नहीं. सभी के लिए शुभ भावना, श्रेष्ठ कामना. मुक्ति जीवन मुक्ति की ऊंची स्थित, फरिश्ता जीवन अभी अभी यहाँ अभी अभी वहाँ.second  में जीवनमुक्त.बुद्धि सदा बेहद में स्थित.एक मेरा बाबा, एक मेरा बेहद लक्ष्य, दैवी गुणों से श्रृंगार.सरलता और निमार्णता. आज विश्व को क्या चाहिए, झूठे दिलासे सुन कर, बड़ी बड़ी लबार सुन कर सब थक गए है, सभी क्या चाहते अभी.. अनुभव. सुन चुके बहुत अभी देखना चाहते है जो दिल से निकले हमारे रक्षक, हमारे सहारे दाता,हमारे इष्ट आ गए.  दो मीठे बोल ,रूहानी दृष्टि , भासना देना, यह फास्ट गति की सेवा अभी सबको करनी है, इसमें कोई खर्चा नहीं मेहनत नहीं सिर्फ बुद्धि की पवित्रता और बाप से clear connection  चाहिए.

श्रेष्ठ कर्म

 कौन से कर्म श्रेष्ठ है. जिसमें कोई मिलावट नहीं,  जो निस्वार्थ है, जिन कर्मों का भाव कर्म करता के आगे स्पष्ट है.कहआ भी जाता है, दुनिया तुम्हें तुम्हारे दिखावे से जानती है, परमात्मा तुम्हें तुम्हारीं से नीयत से जानता है.उससऐ कुछ नहीं छुपता.वओ जानीजाननहार नहीं है पर फिर भी सब जानता है, यह ड्रामा बड़ा ही एक्योरेट बना हुआ है, इसमें किसी के साथ अन्याय हो नहीं सकता.जओ नं लास्ट बना है, उसे ही नंबर फस्ट जाना है, इस अटल भावी को कोई टाल नहीं सकता.84 जन्मों का हिसाब है.इसनऐ ही औलाद राउंड चक्कर लगाया है, अभी अंत में आकर खड़ा हुआ है.इसऐ ही पूरा अनुभव है गुरु ओं का भी अनुभव है, राजआई का भी अनुभव है,गाँवडऐ का भी अनुभव है तो गृहस्थ का भी अनुभव है भक्ति का भी अनुभव है तो उन तीर्थ ओ का शास्त्रों का, जप, तप माला फेरना, यज्ञ रचना, दान पुण्य करना, वेद शास्त्र पढ़ना, बा्हण खिलाना, कथा करना, मुर्ति पूजा करना, भोग लगाना, देवियों का ऋंगार करना, नाच तमाशे करना, बड़ा बड़ा आवाज करना, पूछ वाला हनुमान, सूंड वाला गणेश, 8हआथओ वाली देवियाँ कोई वास्तव में होती नहीं है. कोई शंकर ने कथा नहीं सुनाई पारवती को सूक्...

वाह जिंदगी वाह

  वाह जिंदगी वाह सुबह जल्दी उठो,मुस्कुराओ,नया दिन,भगवान का शुक्रिया करो,सैर पर निकलो। वाह प्रकृति बाहें पसारे हमारा स्वागत कर रही है।पंछी सब चहक रहे है। वाह भगवान ने हमें कितना अच्छा शरीर दिया और जिसे चलाने के लिए फल सब्जियां अनाज भी दिया।शरीर को उपयोग करते जाओ तो वह चलता है और अगर आलस्य हो तो वह खराब हो जाता है फिर उसे न अपने लिए उपयोग कर सकते न दूसरों के लिए। इसी तरह बुद्धि भी उपहार में दे दी उसे जैसे चाहे उपयोग करो सकारात्मक या नकारात्मक  सब हमारे हाथ मे है। इतनी आसान जिंदगी को हमने ही इतना मुश्किल बना दिया। वाह वाह जैसी जिंदगी को हमने ईर्ष्या,द्वेष,प्रतिस्पर्धा,तनाव ,आलस आदि मनोविकारों  में आकर हमने हाय हाय बना दी और तन/मन दोनों को कमजोर कर दिया।अपने जीवन को मुश्किल बना दिया। पढ़ाई के बोझ ने बच्चों के दिमाग की बत्ती गुल कर दी और वह सकारात्मक सोचना ही भूल गए। बचपन और जवानी दोनों  दाव पर लगा दी। डर जीवन का हिस्सा बन गया कि कुछ न बन पाए तो क्या होगा। हल्का रहना तो जैसे भूल ही गए। यह भूल गए कि हल्का रहकर लक्ष्य को पाना ज्यादा आसान है। इतनी अच्छी जिंदगी को हमने बोझ बना...

आत्मा निर्लेप नहीं है

  आत्मा निर्लेप नहीं है... जो खाते, जो बोलते, जो सोचते, हर बात का हिसाब बनता है अवश्य. रिकॉर्ड होता है सब कुछ, अपने पास ही लौट कर आता है, आत्मा सत है चैतन्य है, महसूस करती है ज़रूर गलत करने पर इसलिए कहते है स्वयं ही स्वयं पर रहम करो क्योंकि परमात्मा हमको सज़ा नहीं देता, हम खुद ही पश्चाताप करें बगैर स्वयं को माफ नहीं कर पाते,यहीं कारण होता है आत्मा के अनेक जन्म लेने का और गभ्र जेल मे उतरने का.आत्म खुद अपने जंन्म निर्धारित करती है, कि इस इस स्थान पर, इन इन आत्माओं के साथ उसें आना है इसीलिए कहा जाता है बना बनाया ड्रामा.हमनऐ ही बनाया है अपनी इच्छा शक्ति (will power) के द्वारा , इसलिए इसे अच्छे से अच्छा निभाओ अच्छा पार्ट बजा के, ताकि पुरआनआ हिसाब चुक्तू भी हो जाए और नया अच्छा पार्ट भी भर जाए भविष्य के लिए इसिलिए चुकाते समय बढ़े ही प्यार से खुशी से हल्के होकर.यह नया रिकॉर्ड भरने का समय है तो अच्छा ही भरना चाहिए न. यह ईश्वरइय पढ़ाई नयी दुनिया के लिए है, नये संसकार भरने के लिए पढ़ाई है, और पढ़ाई से सुख भी मिलता है तो पद मिलता है. ऊँ शान्ति

भाग्यवान कौन

  भाग्यवान कौन अगर हम अपने चारों तरफ देखें तो हम उसे ही भाग्यवान समझेंगे जिसके पास धन दौलत भरपूर हो वह जो चाहे खरीद सके पर क्या वो सही मायने में सुखी और भाग्यवान है। दूसरी तरफ हम कहते है अंतर्मुखी सबसे सुखी और कहते हैं पहला सुख निरोगी काया। तो भाग्यवान कौन अंतर्मुखी निरोगी काया वाला या धन दौलत वाला । धन केवल हमें भौतिक सुख दे सकता है। मन का नहीं। इससे भी अधिक भाग्यवान  वह जो भगवान के समीप हो उसकी छत्रछाया में हो उसके समान निर्मल और शीतल हो, परोपकारी हो,दूसरों को सुख देने वाला हो क्योंकि दूसरो को सुख देने से हम दुआओ के पात्र बन जाते है और दुआयें धन से बढ़कर है । वह हमें मन का सुख प्रदान करती है। अच्छे कर्म हमारा भाग्य बनाते है। दूसरो को खुशी देना ,सन्तुष्ट रहना और सन्तुष्ट करके हम वातावरण को अच्छा बना सकते है। आदर सम्मान प्यार से भरा जीवन मिलना और दूसरों को प्यार सम्मान देना यही भाग्य की निशानी है। पद प्रतिष्ठा सुंदरता कुछ समय तक ही हो सकती है। आज है तो कल जा भी सकती है। वह अहंकार को भी जन्म दे सकती है। लेकिन मनुष्य का स्वभाव उसे खुद को व दूसरों सुख पहुंचाता है। और एक सन्तुष्ट...

जीवन का उद्देश्य क्या।

 जीवन का उद्देश्य क्या। हर व्यक्ति चाहता है कि वह शांतिपूर्ण जीवन निर्वाह करे परन्तु जीवन की इस राह को ढूंढने में वह भटक जाता है और भौतिक सुख सुविधाओं और धन को आधार मान लेता है। वास्तव में मूल आवश्यकताओं जैसे भोजन,वस्त्र, भवन आदि जुटाने के बाद अन्य चीजें इच्छाओं की श्रेणी में आती है और यह कभी पूरी नही होती और व्यक्ति लोभी बन जाता है यहां तक कि मृत्यु के समय भी यह सोचता है कि क्या नहीं पाया । एक बार एक सेठ के चार पुत्र थे वह बहुत बीमार हुआ मृत्यु का समय निकट आया तो चारों पुत्र पास आ गए  सबको अपने पास देख कर उसने गुस्से में पूछा तुम सब यहां हो तो दुकान का क्या होगा। अगर हम मूल आवश्यकतओं की पूर्ति के बाद थोड़ा बहुत धन उन लोगों के लिये खर्च करते हैं जो अपनी मूल आवश्यकता पूरी नहीं कर पाते तो समाज मे सदभावना बनी रहती है एकरसता आती है हम पुण्य अर्जित कर पाते है। इस संसार में अच्छाई और बुराई दोनो है और निरन्तर हमारे भीतर युद्ध चलती रहती है कई बार हम भटक जाते है। तुलना ,ईर्ष्या,अहंकार,प्रतिस्पर्धा से दूर रहने पर ही जीवन में शांति और आनंद की प्राप्ति हो सकती है। नर सेवा ही नारायण सेवा है...

Aatma vishleshan

Ander sab khazana hai..  Shubh chintak ki.. Apno ki pehchaan hai? Heero ki pehchaan hai? Preet nibhani aati hai? Vafaadaari kya hai? Shreshta kya hai? Saccha saathi kon hai? Dil tez hai ya dimag? Lootna hai..(baap ke khazane ko, doosro ki respect ko, opportunities ko..ya avinashi gyan, gun, shaktiyon ko) Dhoondhna hai(bada banne ke mauke ko,naye khushi ke khilone ko, kisi ki galtiyon ko ya apne sudhar ke tareeko ko) Churana hai(kisi ke chain ko apne vyavhaar se, kisi ki khushi ko apni activity se, kisi ke haq ko ya kisi ke guno ko)Hisaab rakhna hai.. (Faida nuksaan ka ya apne ulte sankalpon ka.. ) Asli sewa kya hai.. Mat pita ke charno mein.. Ghar mein. Charity begins at home. Ghar wale pyaase aur hum bahar walo ko bhar rahe. Kaisa ajeeb lobh hai ye ,kaisi ajeeb bhukh hai ye maan shaan ki. Kaisi chah hai ye status ki..Kya pa rahe hai hum.. Swayam ko hi thag rahe.. Khud ko hi dhokha de rahe.. Khud se hi jhooth bol rahe.. Doosro ko toh de nai sakte. Kya paaya.. Aur kya kho rahe...

सच्ची उपासना और पूजा क्या है।

सच्ची उपासना और पूजा क्या है। हर व्यक्ति को अपनी विधि से पूजा का अधिकार है  और भगवान को सभी की पूजा स्वीकार्य है। वास्तव में सच्ची उपासना है समाज मे शांति स्थापित करना, संसार से दीनता,भूख और हिंसा को दूर करना ।भेदभाव, अनादर और उपेक्षा भी हिंसा की श्रेणी में आते है। शिवलिंग पर दूध अर्पित करने की बजाय यह दूध उपेक्षित शिशु को मिले यह सच्ची उपासना है क्योंकि यदि जीव व्यथित है तो शिव कैसे प्रसन्न हो सकते है हम सब उनकी सन्तान है। जल शरीर का संचालक है इसके अभाव में मनुष्य और पशु पक्षी व्यथित होते है। तो जल का सर्वोत्तम उपयोग शिवलिंग पर अर्पित करना  नही।बेलपत्र और धतूरा शिव को अति प्रिय है ।परंतु उसका अर्थ है मनुष्य अपनी बुराइयां शिव को अर्पित करे। भगवान की सच्ची उपासना उसके समीप आकर उन जैसा बनना। समीप वही आ सकता जो पवित्र है। फिर सिमरन करो तो वो सुनता है। पुकारो तो आता है। पूजा तो माध्यम है याद का। उपासना वही है जिसमे वह अपने को अपने आराध्य से अलग न समझे कोई अपवित्र विचार न हो, प्रेमपूर्ण ह्रदय हो तो वह समीप है.हर क्षण प्रेमपूर्ण रहे यह तभी संभव है जब वो अपने को पहचाने और पहले  ...

दोस्त कैसा हो

दोस्त ऐसा हो जो  सहारा दे, साथ दे, दिल की बात सुने ! दिल को सुकून दे, हमारी ख़ुशी में खुश हो! हमारा सच्चा शुभ चिन्तक हो! हमें राह दिखाएं! हमारा मार्ग प्रशस्त करें! हमें सम्मान दे, हमें ऊँची दृष्टि से देखें! हमारे विश्वास को बढाएं! दोस्त वो जो  सदा बाहें पसारे स्वागत करें, ऊँचा उठाएं!

हे आत्मा अब फरिश्ता बन

बहुत प्यासे हैं, (स्नेह के, एक झलक के, दर्शन के) भटक रहे हैं! आपको ढूंढ रहे हैं! पुकार रहे हैं! दो शब्द सुनने के चात्रक हैं! आप धरती के सितारे हो! सबकी मनोकामनाएं पूर्ण करने वाले हो! क्या इतना महत्त्व समझते हो अपना या अभी तक पुरुषार्थी हो! क्या अंत तक पुरुषार्थी ही रहना हैं ! क्या सम्पूर्ण त्यागी, सर्व वंश (यानी अंत में बनना हैं, आज दृष्टि ठीक की, कल वृत्ति ठीक की, परसों बोल ठीक किया ----- ! सम्पूर्ण त्याग से सम्पूर्ण स्मृति स्वरुप से सम्पूर्ण नष्टोमोहा और बाप के सम्पूर्ण अधिकार पाना, क्या इस राज को ठीक रीति समझा हैं! या मेहनत ही करते रहेंगे अंत तक ! संगम युग पुरुषार्थ का समय और सतयुग प्रालब्ध का ऐसे तो नहीं समझते! आप ही हो न नयी दुनिया की झलक दिखाने वालें! दुनिया आप फरिश्तो  को ढूंढ रहीं हैं, कब आयेंगे हमारे रक्षक, हमारे सहायक ।