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अच्छी अनुभव की बातें - 3

हार्ड को साॅफट बनाने में, आपको अंदर से सुपर साॅफट और सुपर हार्ड होना पड़ेगा जो कि आध्यात्म द्वारा ही संभव है। आपकी वाणी एक ऐसा शस्त्र जो अनेक आत्माओं के कमजोरीयों के बंधन काट सकता है , उन्हें नयी जीवन जीने की राह दिखा सकता है, उनमें नयी उर्जा का संचार कर सकता है। आपके अनुभव की शक्ति दूसरों को परिवर्तन होने की राह दिखाने में सक्षम है। आपकी समर्थी(शक्ति )सिर्फ आपके अपने तक सीमित नहीं  है , बल्कि अनेकों के उत्थान के लिए है जो आपके आस पास है। जीवन की परिस्थितियां चुनौती है,इनका आह्वान करने वाला ,इन पर जीत पाने वाला व्यक्ति ही महावीर है,शिव शक्ति है। इंतजार में समय गंवाने वाला व्यक्ति कमजोरियों का आह्वान करता है और अपने भाग्य से भी वंचित हो जाता है। निस्वार्थ भाव से किए हुए कर्म जीवन को चमकाते हैं और जीवन की शान को बढ़ाते हैं। अपने स्वयं का टीचर बन स्वयं को पढ़ाने वाले अपने साथ अनेको के लिए पुण्य की पूंजी जमा कराने के निमित्त बनाता है । किसी की भलाई के , सन्मार्ग पर लाने  के लिए किए गए कर्म श्रेष्ठ है भले ऐसे कर्मों को कितने opposition का सामना  क्यों न करना पड़े। आपकी सत्यता ...
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अच्छी अनुभव की बातें - 2

 सभी से सीखने वाला , झुकने वाला व्यक्ति अपनी क्षमता से कहीं अधिक प्राप्ति करता है और दूसरों को भी कहीं ज्यादा आगे बढ़ने के उमंग लाता है। आपको समय पर सीखाने,सहारा देने वाले व्यक्तियों का हमेशा दिल से आभार माने,आभार की शक्ति आपकी अनेक सोई हुई क्षमताओं और शक्तियों को जागृत करेगी। बीती बातों को विदाई देने का अर्थ है, उनसे सीख लेकर, भविष्य के लिए अपने को तैयार करना। परिवर्तन की शक्ति से अपनी पास्ट की भूलों को ऐसा मिटा दो ,जैसे कभी थी ही नहीं। स्नेह का अर्थ सिर्फ इतना नहीं है कि जिसे जो पसंद है, उसे वह  दे दो,करने दो, बल्कि उनको उनके भविष्य के लिए, उनके जीवन में आने वाली अनेक परिस्थितियों के लिए उनको तैयार करना ही सच्चा स्नेह है। दूसरों को सशक्त बनाने में अगर स्वयं को  थोड़ा सहन भी करना पड़े,झुकना भी पड़े तो ये आपको अनेक ईश्वरीय शक्तियों का मालिक बना देगा। प्रकृति द्वारा आए हुई चुनौतीयों को मास्टर प्रकृतिपति बन कर ऐसे जीत लो जैसे, ये प्रकृति आपकी सेवा में हाजिर हो और आपके order पर सब कार्य करती हो।

अच्छी अनुभव की बातें - 1

 जो मनुष्य अपनी प्राप्तियों द्वारा सभी को सुख पहुंचाता है वो समय पर  सभी के द्वारा सम्मान और सर्व प्राप्तियों का अधिकारी बन जाता है। समय पर सभी को सहयोग देने वाला व्यक्ति,जीवन में दुआओं के बल से सदा आगे बढता है। शुभ भावना एक ऐसा बल है, जो अनेक मुश्किल परिस्थितियों से पार कराने का सहज साधन है।  जो व्यक्ति सभी को आगे बढ़ाता है,वह स्वयं पहले अपने आप में बहुत आगे निकल जाता है।   छल कपट और वैर भाव मनुष्य की आंतरिक शक्ति और क्षमता का हनन करती है। अंदर एक और बाहर दूसरा,ऐसे  व्यक्तित्व  वाला व्यक्ति थोड़े समय के लिए  तो जीवन में  छोटी मोटी सफलता का अनुभव कर सकता है पर  लम्बे काल मे जीवन की असल परिक्षाओं में जहां आपके चरित्र की परख होती है,वहां हार जाता है। अंतरात्मा की सच्चाई, मनुष्य के व्यक्तित्व को अंदर से निखारती है,इसका बाहृय दिखावे से कोई लेंन देन नहीं है। मनुष्य जीवन का असली खजाना , उसके जीवन में कमाई हुई शुभ भावनाएं है,जो कि उसके जीवन की असली पूंजी है। ईर्ष्या और घृणा मनुष्य को काला और शक्तिहीन बना देती है। सफलता पाने के लिए इनका सहारा लेना अर...

कबीर दास के प्रेरणादायक दोहे

 कबीर दास के प्रेरणादायक दोहे 1. बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय। जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय॥ अर्थ- कबीर कहते हैं कि जब मैं इस दुनिया में बुराई खोजने गया, तो मुझे कुछ भी बुरा नहीं मिला और जब मैंने खुद के अंदर झांका तो मुझसे खुद से ज्यादा बुरा कोई इंसान नहीं मिला।) . धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय। माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आए फल होय॥  (अर्थ- कबीर दास जी कहते हैं कि धैर्य रखें धीरे-धीरे सब काम पूरे हो जाते हैं, क्योंकि अगर कोई माली किसी पेड़ को सौ घड़े पानी से सींचने लगे तब भी फल तो ऋतु आने पर ही लगेगा।) 3. चिंता ऐसी डाकिनी, काट कलेजा खाए। वैद बिचारा क्या करे, कहां तक दवा लगाए।। (अर्थ- कबीर दास जी कहते हैं कि चिंता एक ऐसी डायन है जो व्यक्ति का कलेजा काट कर खा जाती है। इसका इलाज वैद्य नहीं कर सकता। वह कितनी दवा लगाएगा। अर्थात चिंता जैसी खतरनाक बीमारी का कोई इलाज नहीं है।) 4.  साईं इतना दीजिए, जा मे कुटुम समाय। मैं भी भूखा न रहूं, साधु ना भूखा जाय।। (अर्थ- कबीर दस जी कहते हैं कि परमात्मा तुम मुझे इतना दो कि जिसमें मेरा गुजरा चल जाए, मैं खुद भी अपना पेट पाल सक...

ज्ञान अपने पे लागू करना है

  ज्ञान अपने पे लागू करना है  जैसे अपेक्षा रखना और दुःखी होना गलत है। पर ये बात हमें. खुद पे लागू करनी है दूसरों पर नहीं। हम जानते अपेक्षा होना स्वभाविक है इसलिए हमें खुद को संमपन्न बनाना है और दूसरो की.अपेक्षाओं को पूरा ज़रूर करना है,सभी को सुखी और संतुष्ट करना है, स्नेह निभाना है ,अपना कर्तव्य  पूरा करना है। खुद को सम्पन्न  और संतुष्ट रख सकेगें तब दूसरों को कुछ दे सकेगें। अपेक्षा न रखने का भाव ये है कि जब दूसरों को देखने लगते तो अपनी शक्तियां भूल जाते.है ,भूल जाते है कि हमें देना है। दे तब पाएंगे जब अपने शुद्ध नशे में रहेंंगे। करते क्या.है अपना part और उससे होने वाली प्राप्ति भूल जाते है। सृष्टि चक्र के समय अनुसार अभी सभी को बड़ा ,ऊंच और महान बनना है,परमपवित्र और शुद्ध बनना है,ये भूल जाते है। कभी दूसरों को.बहुत छोटा और हीन देखते है और सोचते हम ही करने.वाले है ,हमारे बिना इनका काम नहीं चलेगा और ये सोच कर अभिमान में आ जाते है और उनका अपमान करने लगते. है,उन्हें नीचे.गिराने.लगते है। कभी दूसरों को बहुत बढ़ा देखने लगते है,कि ये बहुत सम्पन्न है ,हमें कुछ करने की ज़रूरत नहीं। ...

दुआएँ

अपनो से जो स्नेह मिलता ,दुआएँ मिलती, वे अनमोल खज़ाना होती है जीवन का,उससे बढ़ कर कोई सुख नहीं होता दुनिया में।

सिर्फ ज्ञान पता होना काफी नही

सिर्फ ज्ञान पता होना काफी नही। उसे कब और किस विधी से,कितनी मात्रा में देना है यह भी जरूरी है जानना। ज्ञान बंधन काटने का शस्त्र है, न कि बांधने का। इससे किसी को कष्ट पहुंचाना, इसको misuse या abuse करना महापाप है।