बहुत प्यासे हैं, (स्नेह के, एक झलक के, दर्शन के) भटक रहे हैं! आपको ढूंढ रहे हैं! पुकार रहे हैं! दो शब्द सुनने के चात्रक हैं! आप धरती के सितारे हो! सबकी मनोकामनाएं पूर्ण करने वाले हो! क्या इतना महत्त्व समझते हो अपना या अभी तक पुरुषार्थी हो! क्या अंत तक पुरुषार्थी ही रहना हैं ! क्या सम्पूर्ण त्यागी, सर्व वंश (यानी अंत में बनना हैं, आज दृष्टि ठीक की, कल वृत्ति ठीक की, परसों बोल ठीक किया ----- ! सम्पूर्ण त्याग से सम्पूर्ण स्मृति स्वरुप से सम्पूर्ण नष्टोमोहा और बाप के सम्पूर्ण अधिकार पाना, क्या इस राज को ठीक रीति समझा हैं! या मेहनत ही करते रहेंगे अंत तक ! संगम युग पुरुषार्थ का समय और सतयुग प्रालब्ध का ऐसे तो नहीं समझते! आप ही हो न नयी दुनिया की झलक दिखाने वालें! दुनिया आप फरिश्तो को ढूंढ रहीं हैं, कब आयेंगे हमारे रक्षक, हमारे सहायक ।
बहुत प्यासे हैं, (स्नेह के, एक झलक के, दर्शन के) भटक रहे हैं! आपको ढूंढ रहे हैं! पुकार रहे हैं! दो शब्द सुनने के चात्रक हैं! आप धरती के सितारे हो! सबकी मनोकामनाएं पूर्ण करने वाले हो! क्या इतना महत्त्व समझते हो अपना या अभी तक पुरुषार्थी हो! क्या अंत तक पुरुषार्थी ही रहना हैं ! क्या सम्पूर्ण त्यागी, सर्व वंश (यानी अंत में बनना हैं, आज दृष्टि ठीक की, कल वृत्ति ठीक की, परसों बोल ठीक किया ----- ! सम्पूर्ण त्याग से सम्पूर्ण स्मृति स्वरुप से सम्पूर्ण नष्टोमोहा और बाप के सम्पूर्ण अधिकार पाना, क्या इस राज को ठीक रीति समझा हैं! या मेहनत ही करते रहेंगे अंत तक ! संगम युग पुरुषार्थ का समय और सतयुग प्रालब्ध का ऐसे तो नहीं समझते! आप ही हो न नयी दुनिया की झलक दिखाने वालें! दुनिया आप फरिश्तो को ढूंढ रहीं हैं, कब आयेंगे हमारे रक्षक, हमारे सहायक ।

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