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भाग्यवान कौन

  भाग्यवान कौन अगर हम अपने चारों तरफ देखें तो हम उसे ही भाग्यवान समझेंगे जिसके पास धन दौलत भरपूर हो वह जो चाहे खरीद सके पर क्या वो सही मायने में सुखी और भाग्यवान है। दूसरी तरफ हम कहते है अंतर्मुखी सबसे सुखी और कहते हैं पहला सुख निरोगी काया। तो भाग्यवान कौन अंतर्मुखी निरोगी काया वाला या धन दौलत वाला । धन केवल हमें भौतिक सुख दे सकता है। मन का नहीं। इससे भी अधिक भाग्यवान  वह जो भगवान के समीप हो उसकी छत्रछाया में हो उसके समान निर्मल और शीतल हो, परोपकारी हो,दूसरों को सुख देने वाला हो क्योंकि दूसरो को सुख देने से हम दुआओ के पात्र बन जाते है और दुआयें धन से बढ़कर है । वह हमें मन का सुख प्रदान करती है। अच्छे कर्म हमारा भाग्य बनाते है। दूसरो को खुशी देना ,सन्तुष्ट रहना और सन्तुष्ट करके हम वातावरण को अच्छा बना सकते है। आदर सम्मान प्यार से भरा जीवन मिलना और दूसरों को प्यार सम्मान देना यही भाग्य की निशानी है। पद प्रतिष्ठा सुंदरता कुछ समय तक ही हो सकती है। आज है तो कल जा भी सकती है। वह अहंकार को भी जन्म दे सकती है। लेकिन मनुष्य का स्वभाव उसे खुद को व दूसरों सुख पहुंचाता है। और एक सन्तुष्ट...

जीवन का उद्देश्य क्या।

 जीवन का उद्देश्य क्या। हर व्यक्ति चाहता है कि वह शांतिपूर्ण जीवन निर्वाह करे परन्तु जीवन की इस राह को ढूंढने में वह भटक जाता है और भौतिक सुख सुविधाओं और धन को आधार मान लेता है। वास्तव में मूल आवश्यकताओं जैसे भोजन,वस्त्र, भवन आदि जुटाने के बाद अन्य चीजें इच्छाओं की श्रेणी में आती है और यह कभी पूरी नही होती और व्यक्ति लोभी बन जाता है यहां तक कि मृत्यु के समय भी यह सोचता है कि क्या नहीं पाया । एक बार एक सेठ के चार पुत्र थे वह बहुत बीमार हुआ मृत्यु का समय निकट आया तो चारों पुत्र पास आ गए  सबको अपने पास देख कर उसने गुस्से में पूछा तुम सब यहां हो तो दुकान का क्या होगा। अगर हम मूल आवश्यकतओं की पूर्ति के बाद थोड़ा बहुत धन उन लोगों के लिये खर्च करते हैं जो अपनी मूल आवश्यकता पूरी नहीं कर पाते तो समाज मे सदभावना बनी रहती है एकरसता आती है हम पुण्य अर्जित कर पाते है। इस संसार में अच्छाई और बुराई दोनो है और निरन्तर हमारे भीतर युद्ध चलती रहती है कई बार हम भटक जाते है। तुलना ,ईर्ष्या,अहंकार,प्रतिस्पर्धा से दूर रहने पर ही जीवन में शांति और आनंद की प्राप्ति हो सकती है। नर सेवा ही नारायण सेवा है...

Aatma vishleshan

Ander sab khazana hai..  Shubh chintak ki.. Apno ki pehchaan hai? Heero ki pehchaan hai? Preet nibhani aati hai? Vafaadaari kya hai? Shreshta kya hai? Saccha saathi kon hai? Dil tez hai ya dimag? Lootna hai..(baap ke khazane ko, doosro ki respect ko, opportunities ko..ya avinashi gyan, gun, shaktiyon ko) Dhoondhna hai(bada banne ke mauke ko,naye khushi ke khilone ko, kisi ki galtiyon ko ya apne sudhar ke tareeko ko) Churana hai(kisi ke chain ko apne vyavhaar se, kisi ki khushi ko apni activity se, kisi ke haq ko ya kisi ke guno ko)Hisaab rakhna hai.. (Faida nuksaan ka ya apne ulte sankalpon ka.. ) Asli sewa kya hai.. Mat pita ke charno mein.. Ghar mein. Charity begins at home. Ghar wale pyaase aur hum bahar walo ko bhar rahe. Kaisa ajeeb lobh hai ye ,kaisi ajeeb bhukh hai ye maan shaan ki. Kaisi chah hai ye status ki..Kya pa rahe hai hum.. Swayam ko hi thag rahe.. Khud ko hi dhokha de rahe.. Khud se hi jhooth bol rahe.. Doosro ko toh de nai sakte. Kya paaya.. Aur kya kho rahe...

सच्ची उपासना और पूजा क्या है।

सच्ची उपासना और पूजा क्या है। हर व्यक्ति को अपनी विधि से पूजा का अधिकार है  और भगवान को सभी की पूजा स्वीकार्य है। वास्तव में सच्ची उपासना है समाज मे शांति स्थापित करना, संसार से दीनता,भूख और हिंसा को दूर करना ।भेदभाव, अनादर और उपेक्षा भी हिंसा की श्रेणी में आते है। शिवलिंग पर दूध अर्पित करने की बजाय यह दूध उपेक्षित शिशु को मिले यह सच्ची उपासना है क्योंकि यदि जीव व्यथित है तो शिव कैसे प्रसन्न हो सकते है हम सब उनकी सन्तान है। जल शरीर का संचालक है इसके अभाव में मनुष्य और पशु पक्षी व्यथित होते है। तो जल का सर्वोत्तम उपयोग शिवलिंग पर अर्पित करना  नही।बेलपत्र और धतूरा शिव को अति प्रिय है ।परंतु उसका अर्थ है मनुष्य अपनी बुराइयां शिव को अर्पित करे। भगवान की सच्ची उपासना उसके समीप आकर उन जैसा बनना। समीप वही आ सकता जो पवित्र है। फिर सिमरन करो तो वो सुनता है। पुकारो तो आता है। पूजा तो माध्यम है याद का। उपासना वही है जिसमे वह अपने को अपने आराध्य से अलग न समझे कोई अपवित्र विचार न हो, प्रेमपूर्ण ह्रदय हो तो वह समीप है.हर क्षण प्रेमपूर्ण रहे यह तभी संभव है जब वो अपने को पहचाने और पहले  ...

दोस्त कैसा हो

दोस्त ऐसा हो जो  सहारा दे, साथ दे, दिल की बात सुने ! दिल को सुकून दे, हमारी ख़ुशी में खुश हो! हमारा सच्चा शुभ चिन्तक हो! हमें राह दिखाएं! हमारा मार्ग प्रशस्त करें! हमें सम्मान दे, हमें ऊँची दृष्टि से देखें! हमारे विश्वास को बढाएं! दोस्त वो जो  सदा बाहें पसारे स्वागत करें, ऊँचा उठाएं!

हे आत्मा अब फरिश्ता बन

बहुत प्यासे हैं, (स्नेह के, एक झलक के, दर्शन के) भटक रहे हैं! आपको ढूंढ रहे हैं! पुकार रहे हैं! दो शब्द सुनने के चात्रक हैं! आप धरती के सितारे हो! सबकी मनोकामनाएं पूर्ण करने वाले हो! क्या इतना महत्त्व समझते हो अपना या अभी तक पुरुषार्थी हो! क्या अंत तक पुरुषार्थी ही रहना हैं ! क्या सम्पूर्ण त्यागी, सर्व वंश (यानी अंत में बनना हैं, आज दृष्टि ठीक की, कल वृत्ति ठीक की, परसों बोल ठीक किया ----- ! सम्पूर्ण त्याग से सम्पूर्ण स्मृति स्वरुप से सम्पूर्ण नष्टोमोहा और बाप के सम्पूर्ण अधिकार पाना, क्या इस राज को ठीक रीति समझा हैं! या मेहनत ही करते रहेंगे अंत तक ! संगम युग पुरुषार्थ का समय और सतयुग प्रालब्ध का ऐसे तो नहीं समझते! आप ही हो न नयी दुनिया की झलक दिखाने वालें! दुनिया आप फरिश्तो  को ढूंढ रहीं हैं, कब आयेंगे हमारे रक्षक, हमारे सहायक ।

ज्ञान का सार

ज्ञान का सार 1.     दान देने से बढ़ता है। 2.     क्षमा-दया – सुखी रखना। 3.     जीवन में अनुभवों से जो सीखता वह आगे बढ़ता। 4.     पुण्य कर्म/श्रेष्ठ कर्म/निस्वार्थ कर्म ही मनुष्य की सबसे बड़ी पूंजी है। 5.     जीतना है तो दिलों को जीतो , छोड़ना है तो अंहकार को छोड़ों। 6.     बदलना है तो खुद को बदलो। 7.     सफलता मिल जाए तो बहुत खुश मत हो जाना , असफलता मिले तो निराश मत होना , यह जीवन हार-जीत , सफलता-असफलता , सुख-दु:ख का खेल है। 8.     आगे बढ़ने के लिए कभी झूठ , ठगी , छीनना , लूटना , रौंदना यह रास्ता सही नही है। 9.     ऊंचा उठने के लिए कभी किसी को नीचा नही दिखाना। 10. अपने गुणों की , अपने महान कार्यों की , महीमा की आशा नहीं रखना , वर्णन करने में महानता नहीं। मुख में अग्नि का वास होता है। 11. जो आपके पास है वह एक अच्छा जीवन सम्मानपूर्वक जीवन जीने के लिए बहुत है। 12. अपने आप से तुलना मनुष्य को आगे बढ़ाती। 13. सर्व को सम्मानपूर...