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वर्तमान समय अनुसार श्रेष्ठ स्मृति और स्व परिवर्तन



इस ब्राह्मण जीवन में कई बार चलते चलते कई प्रश्नो में मन घिर जाता है,आज हम उन्ही पर कुछ चर्चा करेंगे।
जीवन में बोझ  का कारण क्या है ,आखिर भी क्या सेवा करे और किसकी सेवा करें जो हलके सेहतमंद और सफलता मूर्ति रहे। बाबा कहते है तुम आत्माओं  का कनेक्शन प्रकृति से निरंतर है ,आत्मा ने पाप पुण्य शरीर द्वारा ही किये है तोह फल भी शरीर द्वारा ही आत्मा भोगती है ,और कर्म एक ऐसी चीज़ है जो निरंतर  आआत्स््स््स््स््स्स्स्् जुड़ा हुआ है ,तौर याद भी ऐसी चीज़ है जो आत्मा से निरंतर जुडी हुई है ,आत्मा किसी न किसी बात को ,किसी न किसी स्मृति को याद ज़रूर करती है. तो क्यों न अपने कर्म और स्मृतियों को ऊँचा उठा ले और सहेज योगी बन इस शरीर रुपी प्रकृति सहित आत्मा को पावन  बना दे.अब अगला प्रश्न उठता है कौन से ऐसे कर्म करे ाजो ऊंच कहलाए और कोनसी ऐसी स्मृति हो इस दुनिया से पार ले जाए?कर्मो का चयन बहुत सरल है जिसमे हमारे अपने रोज़मर्रा के निजी कर्म के साथ जो भी हमारे सम्बन्ध संपर्क में आता है उसकी सतुष्टता
उनको हमारे द्वारा कोई न कोई ईश्वरीय गुण  की अनुभूति ,जो ही उनकी उन्नति का मार्ग खोलेगा,हिम्मत दिलाएगा,स्वमान बढ़ाएगा ,ख़ुशी में लाएगा ,जागृति बढ़ाएगा,स्नेह में लाएगा,पुण्य कर्मो में विश्वास बढ़ाएगा ,जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण बनाने में मददकरेगा,परमात्मा के प्रति  विश्वास बढ़ाने में मदद करेगा। हम ही निमित क्यों बने उनके विघ्न हटाने के। क्योंकि,हम ही शायद कभी उन्हें नीचे लाने के। अभी समय आया है चक्कर फिर है चढ़ती कला में जाने का,और सब को ले जाने का और सहजयोगी बन ईश्वरीय  स्मृतियों
में रहने,इस देह से उपराम रहने का,ऊँचे स्वमान में रहने का और सेकंड में व्यक्त देश और व्यक्त स्मृतियों से पार जा  कर नष्टोमोहा बन पंछी बन उड़ जाने का। ऐसे सुन्दर समय ामें अगर कोई अपनी कमज़ोरियों के कारण अपने दरवाजे खिड़कियाँ बंद कर मेहनत  से कर्म बंधन से छूटने में लगा रहे,श्रेष्ठ भाग्य को न पहचान युद्ध में,पश्चाताप में या अपने ही स्वमलते नशे में लगा रहे तो संगम युग की जो सहज  प्राप्ति है तो उससे तो
वंचित हुआ  न, कारण क्या हुआ अपनी ही सिमित सोच और परख शक्ति और निर्णय शक्ति  की कमी ,जिसमे सारा समय अपने ही  विघ्नो प्रति लगा दिया और स्वयं श्रेष्ट प्राप्ति से,श्रेष्ठ स्वमान से वंचित रहे और दूसरो को भी बनाया,तो ऐसी आत्मा बोझ  का ही अनुभव करेगी न। समय के अनुसार अपने पुरुषार्थ की गति(speed ) और विधि (method )को,सेवा की गति विधि को  नहीं बदला अथार्त यथाशक्ति प्राप्ति करने वालों की लाइन में आ जाना। एक प्रश्न और उठता है ,सम्बन्ध संपर्क में आने वाली तो कई आत्माएं  है कैसे जाने किसके साथ कितना हिसाब है। बहुत आसान तरीका है अपनी सुनने की क्षमता को बढ़ाये ,ध्यान से देखे,सुने ,नियति के इशारों को समझे ,समानता की ट्यूनिंग को समझे ,अपने अंतर मन की आवाज़ सुने ,अपनी आंतरिक मांग को पहचाने,सही गाठ जज करने से पहले सच्चाई से सुने अपने दिल की। अंग्रेजी में एक कहावत है what  you  are seeking  is  seeking you अर्थात 'आप जिसे ढूंढ  रहे है वह आपको ढूंढ  रहा है। ' ड्रामा कल्याणकारी है और हमारी favour  में बना हैं,यहाँ पर होने वाली परप्रत्येक घटना हमे एक अवसर प्रदान कर रही है की हम कोई अपनी पास्ट की भूल को सुधार  नए सुख के खाते जमा कर ले पर विडम्बना यह है मनुष्य अपनी ही रची हुयी दुनिया में रहता है,अपने पास्ट के अनुभवों का ,उन्ही के  आधार पर बानी मान्यतों पर अपने जीवन को चलाने  में वह सुरक्षित महसूस करता है,ये भी जाल है जैसे ,अपने मन  का ही वहम है। अपने को ताले चाबी में बंद करने से तो निश्चय ही खज़ाना चोरी हो  जाएगा,इसलिए कहा गया है खुली सोच और ऊँचे विचार रखो,जीवन का मर्म समझो,बांटना और बढ़ाना सीखो,सबको गले लगाना सीखो,निष्काम भाव से देना सीखो,सबसे प्रीत निभाना सीखो ,अपने से पहले दूसरो का सोचो,समय पर काम आना सीखो,ऊंच नीच का भेद मिटाना सीखो ,दुखियों के आंसू पोछना सीखो,मीठी वाणी बोलना सीखो,सबको राहत देना, सुकूंन देना  सीखो,सबके कष्ट हरना सीखो ,मैं से परे ,मेरे से मापारे होना सीखो ,अपने साथ सबके जीवन को स्वर्ग बनाना सीखो,अपनी पसंद से परे इश्वरिये मर्ज़ी पर चलना सीखो।

ऐसे निरंतर कर्म और योग द्वारा हलकी जीवन,सहेज जीवन अनुभव करने वाले,निरतर सजग रह नियति के इशारो को समझने वाले,ऐसे समय प्रमाण विशाल बुद्धि हो अपने पुरुस्था और सेवा की गति विधि को बदलने वाले,ऐसे जीवन के सार को कर्मों में लाने वाले महान ईश्वर के चुने हुए रत्नो को बाप दादा और मुझ खुदाई खिदमतगार आत्मा का याद प्यार और नमस्ते

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